प्रभु यीशु मसीह ने व्यवस्था को किस प्रकार पूरा किया Jesus message

प्रभु यीशु मसीह ने व्यवस्था को किस प्रकार पूरा किया Jesus Vachan

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प्रभु यीशु मसीह ने व्यवस्था को किस प्रकार पूरा किया

प्रभु यीशु मसीह ने व्यवस्था को किस प्रकार पूरा किया?

प्रभु यीशु मसीह ने व्यवस्था को किस प्रकार पूरा किया? पॉलस कहते हैं जो व्यवस्था है वह आत्मिक है पवित्र है और आज्ञाभी ठीक है लेकिन हम जो मनुष्य हैं वह शारीरिक है। हमने उससे पूरी रीती से शरीफ बना दिया। यानी कि हम व्यवस्था के कार्यों को तो पूरा कर रहे हैं लेकिन परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर रहे हैं अपने जीवन को पापमय तरीके से जी रहे हैं। यह सोच कर कि हम पाप को बलि चढ़ा देंगे हम हम बलि चढ़ा देंगे ताकि हमारे पापों का प्रायश्चित हो सके।

 हम देखते हैं कि जो इजरायली थे पूरी रीती से शारीरिक हो चुके थे तो यहां पर जरूरी था की प्रभु यीशु मसीह के द्वारा वह जो आत्मिक व्यवस्था है उसे आत्मिक रिती से लागू करें यानी जो आत्मिक व्यवस्था थी वह शारीरिक रूप से लागू की गई थी। हम मसीही विश्वासी है। हम हर हफ्ते चर्च जाते हैं। हम आराधना करते हैं। हम प्रभु भोज लेते हैं। 10 वा अंश देते हैं। हम सुबह बाइबल पढ़ते हैं और सभी धार्मिक कार्य करते हैं और हम यह सोचने लगते हैं कि हमने सारे कार्य किए हैं और मैं इन सभी कार्यों के द्वारा परमेश्वर की नजरों में धार्मिक गिना जाऊंगा।

लेकिन हमारे निजी जीवन में इन सभी कार्यों के बावजूद अगर हमारे जीवन में घमंड है हमारे जीवन में व्यभिचार है हमारे जीवन में किसी की निंदा है तो हम परमेश्वर की नजरों में धार्मिक नहीं है। यही उस वक्त इजरायलीयो के साथ हुआ। जब उन्हें आत्मिक व्यवस्था दी गई तब उन्होंने उसे उस व्यवस्था को शरीर के कार्यों से करके अपने आप को धर्मिक बनाना शुरु कर दिया यानी कि उनके जीवन में जरा सी भी आत्मिकता नहीं थी।

वह पाप में पड़े हुए हैं। वो परमेश्वर के विरुद्ध कार्य कर रहे हैं लेकिन वो जो व्यवस्था के कार्य है उन्हें वह बड़ी ध्यान से पूरा कर रहे हैं। बलि चढ़ाना हर वक्त सभी विधियां पूरी करना। सभी पर्व मनाना। यह सभी चीजें वह पूरी ध्यान से पूरा करते थे लेकिन उनके जीवन में आत्मिकता नहीं थी। और प्रभु यीशु मसीह ने इस विषय में कहा है। मत्ती अध्याय 23 वचन 23 " हे कपटी शास्त्रीयो, और फरीसियो, तुम पर हाय; तुम पोदीने और जिरे का 10 वा अंश देते हो, परंतु तुमने व्यवस्था कि गंभीर बातों को अर्थात न्याय, दया और विश्वास को छोड़ दिया है;" यहां पर प्रभु यीशु ने यह बात कही है की हमें व्यवस्था को शारीरिक रूप से लागू ना करके आत्मिक रूप से लागू करना चाहिये।

यही बात पॉलस हमने समझा रहे हैं की यदि हमें विश्वास होगा तो हमारे जीवन में भलाई के कार्य पाए जाएंगे। यदि हमें कोई कार्य करने नहीं दिया जाएगा तो हमारे पास कोई ऐसी चीज नहीं होगी जिससे हम खुद को धर्मी ठहरा पाए। और आज हम जानते हैं जो मसीही विश्वासी है वह अपने आप को धर्मी केवल विश्वास और अपने कार्यों से ठेहरा सकते है।

पॉलस हमे कहते है की हम मसीह मे हमारे अंदर के पुराने मनुष्य को मार देते हैं और उसमें नए कार्यों के साथ जी उठते हैं। तो यहां पर हमारे पास कोई कार्य नहीं है हमसे यह नहीं कहा गया कि हमें जरूरी है कि हम उपवास करें या दसवां अंश देना है हमें किसी भी चीज के लिए बंधन नहीं बनाया गया ना ही किसी भी चीज को धार्मिकता कहां गया इसीलिए ऐसा ना हो इजरायल के लोग भटक गए थे वह संसारी हो गए थे वह शारीरिक कार्यों में व्यस्त हो गए थे कहीं ऐसा ना हो कि हम भी उसी तरह सांसारिक और शारीरिक कार्यों में व्यस्त हो जाए।

इसलिए और नए केवल व्यवस्था दी गई जो कि  आत्मिक  और विश्वास की व्यवस्था थी। क्योंकि जो विश्वास करेगा वह कभी भी प्रभु यीशु मसीह के विरुद्ध कार्य नहीं करेगा। हमेशा उसकी आज्ञा में चलेगा। और वह किसी भी शरीर कार्यों को धार्मिकता ना समझ कर अपने चाल चलन को और स्वभाव को अपनी दिनता को अपनी नम्रता को और प्रभु के स्वभाव में जो नई सृष्टि बना है उसी को वह धार्मिकता समझेगा।

और सभी उस कार्यों से बचेगा जिससे हमारा आत्मिक जीवन बर्बाद हो सकता है। इसिलीये पॉलस रोमियो अध्याय 7 और वचन 5 मे कहते है की " क्योंकि जब हम शारीरिक थे, तो पापों की अभिलाषाए जो व्यवस्था के द्वारा थी, मृत्यु का फल उत्पन्न करने के लिए हमारे अंगों में काम करती थी।" प्रभु यीशु ने हमें विश्वास की व्यवस्था दी है इसलिए हम अब कार्यों के गुलाम नहीं रहे बल्कि विश्वास के अधीन हो गए हैं। आत्मिक ता के अधीन हो गए हैं।
आमीन !!!








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